भक्तामर स्तोत्र: दिव्यता और शक्ति का स्रोत
परिचय: भक्तामर स्तोत्र जैन धर्म का एक अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसे आचार्य मानतुंग ने रचा था। इस स्तोत्र में 48 श्लोक हैं, जिनमें भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की महिमा का गान किया गया है। भक्तामर का शाब्दिक अर्थ है 'भक्तों द्वारा अमर' — अर्थात् ऐसा स्तोत्र जो भक्तों की भक्ति से अमर हो गया है। इसकी प्रत्येक श्लोक में इतनी शक्ति और दिव्यता है कि यह जीवन की हर समस्या का समाधान कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि इस स्तोत्र के माध्यम से आचार्य मानतुंग ने अपनी भक्ति से लोहे की बेड़ियों को भी तोड़ दिया था।
भक्तामर स्तोत्र की रचना और महत्व
आचार्य मानतुंग स्वामी को राजा भोज ने कारागार में बंदी बना दिया था। कारागार में रहते हुए ही उन्होंने अपनी अद्वितीय भक्ति और तप से भक्तामर स्तोत्र की रचना की। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है, जो हमारे मन, वाणी और काया को पवित्र करती ...