बलिया।
संत रैदास को सही तरह से समझने के लिए उनके दोहों को पढ़ना ज़रूरी है। किसी भी महापुरुष के मूल विचारों तक पहुँचने के लिए उनके साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। सभ्य समाज के निर्माण के लिए गंभीर सोच की आवश्यकता है।
ये बातें कहानीकार और ‘गाँव के लोग’ पत्रिका के संपादक रामजी यादव ने कहीं। वे कलेक्ट्रेट स्थित अंबेडकर संस्थान परिसर में संत रैदास जयंती की पूर्व संध्या पर आयोजित गोष्ठी ‘संत रैदास का समतामूलक समाज और आज का भारत’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
रामजी यादव ने कहा कि संत रैदास एक क्रांतिकारी व्यक्तित्व थे। जब समाज में शिक्षा, अधिकार और आज़ादी की बात शुरू हुई, तो ऊँचे वर्ग के लोगों में बेचैनी दिखने लगी। संत रैदास ने मनुवादी सोच, वर्णवाद और हर तरह की ऊँच-नीच का विरोध किया। उन्होंने समानता और मानव गरिमा पर आधारित समाज का सपना देखा। उनका दर्शन आज भी समाज के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने नई पीढ़ी से अपील की कि वह गुलामी और भेदभाव की ज़ंजीरों को तोड़े।
डॉ. राम कुमार कन्नौजिया ने ‘बेगमपुरा’ की व्याख्या करते हुए बताया कि संत रैदास ऐसे समाज की कल्पना करते थे जहाँ कोई दुख न हो, कोई छोटा-बड़ा न हो और सभी बराबर हों। उन्होंने संत रैदास के दोहे “मन चंगा तो कठौती में गंगा” का अर्थ समझाते हुए कहा कि अगर मन शुद्ध हो तो किसी तीर्थ या गंगा स्नान की आवश्यकता नहीं होती।
गोष्ठी में साहनी वीरेंद्र, बौद्ध बृजेश, वीरेंद्र पासवान, हरिहर राम, रवि राणा, रमाशंकर राम, मोहन राम, कालिका प्रसाद, शमीम खान, अवधेश वर्मा, सूरज समदर्शी, डॉ. उमेश, गोरख पासबान बलियावी सहित कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता बलवंत सिंह ने की और संचालन शैलेश धुसिया ने किया। आयोजन सम्यक जन चेतना फाउंडेशन की ओर से किया गया।
बलिया रिपोर्टर : संजय सिंह








