लखनऊ। पुलिस कमिश्नरेट के पूर्वी जोन को लेकर इन दिनों गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कुछ पुलिसकर्मी अब भी सिस्टम का हिस्सा बने हुए हैं, जो न तो विवेचना (जांच) का समयबद्ध और प्रभावी निस्तारण कर पा रहे हैं और न ही अपने क्षेत्र में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने में सफल हो रहे हैं। इससे पीड़ितों में असंतोष बढ़ रहा है और पुलिस विभाग की छवि भी प्रभावित हो रही है।
मामले में विशेष रूप से एक पुलिसकर्मी राजन केसरी का नाम चर्चा में है। उन पर आरोप है कि बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद उनकी कार्यशैली में कोई खास सुधार नहीं आया है। विवेचना के कई मामलों में ठोस परिणाम न मिलने से सवाल और गहरे होते जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि ऐसे कर्मियों की निष्क्रियता के कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो रही है।
दूसरी ओर, पूर्वी जोन के पुलिस उपायुक्त शशांक सिंह कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सक्रिय प्रयास कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में अतिक्रमण हटाने, अपराध नियंत्रण और पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में लगातार कार्रवाई की जा रही है।
कई पुलिसकर्मी भी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं, जिससे विभाग की साख मजबूत हो रही है।इसके बावजूद आरोप यह भी हैं कि कुछ पुलिसकर्मी वरिष्ठ अधिकारियों के सामने तो खुद को सक्रिय और कर्तव्यनिष्ठ दिखाते हैं, लेकिन निगरानी कम होते ही उनकी कार्यशैली ढीली पड़ जाती है।
कुछ पर अवैध गतिविधियों, अतिक्रमण और छोटे कारोबारियों से कथित रूप से लाभ लेने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। इससे न केवल कानून व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि अपराध को भी अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलता है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि लापरवाह और संदिग्ध कार्यशैली वाले पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई कब होगी। क्या उन्हें लगातार सुधार का मौका मिलता रहेगा या विभाग उनकी जवाबदेही तय करेगा? यह मुद्दा पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार की जरूरत को स्पष्ट रूप से उजागर करता है, ताकि आम जनता का भरोसा कायम रह सके।






