वाराणसी। ठंड के मौसम में काशी आए साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की संख्या प्रजनन काल के बाद तेजी से बढ़ गई है। गंगा घाट इन दिनों इन रंग-बिरंगे और मधुर कलर वाले परिंदों की चहचहाहट से गुलजार नजर आ रहे हैं। प्रजनन के बाद जब नन्हे परिंदे उड़ने लायक हो रहे हैं, तब घाटों पर इनकी मौजूदगी और भी बढ़ गई है, जिससे काशी की प्राकृतिक सुंदरता में चार चाँद लग गए हैं।
साइबेरिया से काशी तक का सफर
प्रत्येक साल अक्टूबर-नवंबर से मार्च तक साइबेरियन प्रवासी पक्षी ठंड से बचने काशी का रुख करते हैं। लगभग 6,000 किलोमीटर की यात्रा के बाद ये पक्षी गंगा और अन्य नदियों के तटों पर पहुंचते हैं। दिसंबर से फरवरी तक उनका प्रमुख प्रजनन काल होता है। मार्च-अप्रैल तक बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं, और इसके बाद ये अपने मूल स्थान साइबेरिया लौट जाते हैं।
घाटों पर बढ़ी चहल-पहल
अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, राजघाट और अन्य प्रमुख घाटों पर इन प्रवासी पक्षियों की संख्या बढ़ती दिख रही है। रंग-बिरंगे पंख और मधुर कलर घाटों की शोभा बढ़ा रहे हैं। श्रद्धालु, सैलानी और स्थानीय लोग इस दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो रहे हैं।
नावों के साथ उड़ान भरते पक्षी
सुबह और शाम गंगा में नाव की सैर के दौरान लोग इन्हें दाना खिलाते हैं। दाना मिलते ही ये पक्षी नावों के पीछे उड़ते और पानी पर उतरकर चुगते दिखाई देते हैं। यह दृश्य पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बन गया है।
पर्यावरण संतुलन का सकारात्मक संकेत
पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रवासी पक्षियों की बढ़ती संख्या दर्शाती है कि गंगा घाटों का पर्यावरण अभी भी उनके लिए अनुकूल है। यह जैव विविधता और प्राकृतिक संतुलन के लिए सकारात्मक संकेत है।
संरक्षण और सावधानी जरूरी
विशेषज्ञों ने कहा कि पक्षियों को दाना खिलाते समय सावधानी बरती जाए और प्लास्टिक कचरे से बचाव किया जाए, ताकि उनका प्राकृतिक आहार और व्यवहार प्रभावित न हो।
काशी के घाटों पर साइबेरियन प्रवासी पक्षियों की यह उपस्थिति न केवल शहर की सुंदरता बढ़ा रही है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के महत्व को भी उजागर कर रही है।









