प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने झूठे मुकदमों और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग पर सख्त रुख अपनाते हुए बड़ा और ऐतिहासिक आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस जांच में यह पाया जाता है कि एफआईआर झूठी या भ्रामक सूचना के आधार पर दर्ज कराई गई थी, तो विवेचना अधिकारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह सूचना देने वाले व्यक्ति के खिलाफ झूठी गवाही और गुमराह करने के आरोप में लिखित शिकायत दर्ज कराए।

यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने 14 जनवरी 2026 को “उम्मे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य” मामले में पारित किया। अदालत ने कहा कि फर्जी मुकदमों के जरिए कानून और पुलिस तंत्र का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 212 और 217 (पूर्व में आईपीसी की धारा 177 और 182) का हवाला देते हुए कहा कि झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ कार्रवाई करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है। यदि विवेचक, थाना प्रभारी, क्षेत्राधिकारी या लोक अभियोजक इस दायित्व का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ BNS की धारा 199(बी) (पूर्व में आईपीसी की धारा 166A) के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
अदालत ने आदेश के पैरा 50 में चेतावनी दी कि यदि इस आदेश का अक्षरशः पालन नहीं किया गया, तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। पीड़ित व्यक्ति सीधे हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल कर सकता है।
कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और सभी न्यायिक अधिकारियों को आदेश की तिथि से 60 दिनों के भीतर इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ पंजाब बनाम राज सिंह (1998) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि झूठी सूचना के मामलों में लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब पुलिस किसी मामले में यह कहते हुए अंतिम रिपोर्ट लगाए कि आरोप झूठे हैं, तो मजिस्ट्रेट तब तक उस रिपोर्ट को स्वीकार न करें, जब तक झूठी सूचना देने वाले के खिलाफ लिखित शिकायत संलग्न न हो। यदि प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल होती है, तो पुलिस की शिकायत पर कार्यवाही प्रोटेस्ट पिटीशन के निस्तारण तक स्थगित रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि वैवाहिक विवाद से जुड़ी थी, जिसमें पति ने पत्नी के खिलाफ आईपीसी की धारा 504 और 507 के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी। पुलिस जांच में आरोप झूठे पाए गए और फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई, लेकिन अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार कर मामले को स्टेट केस मान लिया। हाईकोर्ट ने इसे कानूनन गलत ठहराते हुए संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि असंज्ञेय अपराधों में पुलिस रिपोर्ट को परिवाद माना जाएगा, न कि स्टेट केस। साथ ही मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया गया कि आरोपी को सुनवाई का अवसर देते हुए तीन माह के भीतर नया आदेश पारित करें।









