उत्तर प्रदेश का गाजीपुर कभी अफीम की बेहतरीन खेती के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध था। यहां की मिट्टी में उगी अफीम की गुणवत्ता इतनी उच्च थी कि अंग्रेज़ों ने वर्ष 1820 में यहीं पर एशिया का सबसे बड़ा अफीम प्रोसेसिंग कारखाना स्थापित किया। इसके जरिए अफीम से बने विभिन्न औषधीय उत्पादों की प्रोसेसिंग और पैकिंग कर उन्हें देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में भेजा जाने लगा।
एक समय था जब गाजीपुर में अफीम की खेती किसानों की आय का बड़ा स्रोत थी। हजारों परिवार इससे जुड़े थे। खेती से लेकर फैक्ट्री तक, बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता था और सरकार को भी भारी राजस्व प्राप्त होता था।
लेकिन अब सवाल यह है कि जब गाजीपुर में एशिया का सबसे बड़ा प्रोसेसिंग सेंटर मौजूद है, तब भी यहां अफीम की खेती क्यों लगभग समाप्त हो गई?
क्यों उजड़ गई अफीम की परंपरागत खेती?
गाजीपुर में अफीम की खेती के घटने के पीछे कई कारण माने जाते हैं—
1. सरकारी लाइसेंस की सख्ती
अफीम एक नियंत्रित फसल है और इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से विशेष लाइसेंस की जरूरत होती है। समय के साथ लाइसेंस की संख्या कम होती गई, जिससे किसानों ने अन्य फसलों की ओर रुख कर लिया।
2. उत्पादन मानक पूरे करने में कठिनाई
सरकार द्वारा निर्धारित मॉर्फीन कंटेंट और अन्य मानकों को पूरा करना कई बार किसानों के लिए मुश्किल हो गया। मानक पूरे न होने पर लाइसेंस नवीनीकरण में बाधा आने लगी।
3. मौसम और मिट्टी में बदलाव
बीते वर्षों में जलवायु परिवर्तन, असमान वर्षा और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में गिरावट ने अफीम उत्पादन को प्रभावित किया।
4. आधुनिक कृषि की ओर रुझान
कई किसानों ने कम समय, कम जोखिम और बेहतर दाम देने वाली फसलों की ओर रुख किया—जैसे आलू, गेहूं, दलहन, तिलहन आदि।
फिर भी गाजीपुर का महत्व बरकरार
आज भले ही गाजीपुर में अफीम की खेती घट चुकी हो, लेकिन यहां स्थित ऑपियम फैक्ट्री देशभर के विभिन्न राज्यों से अफीम लेकर उसकी प्रोसेसिंग करती है। यहीं पर अफीम से मॉर्फीन, कोडीन, फार्मास्यूटिकल ग्रेड ड्रग्स और अन्य महत्वपूर्ण औषधीय पदार्थ बनाए जाते हैं और फिर इन्हें सील पैक कर वैश्विक बाजार में भेजा जाता है।
इस तरह गाजीपुर एक समय में खेती के लिए मशहूर था, आज देश की अफीम आधारित औषधीय जरूरतों के सबसे बड़े औद्योगिक केंद्र के रूप में सक्रिय है।
ब्यूरोचीफ –संजय यादव









