वाराणसी। औद्योगीकरण और वैश्वीकरण के दौर में संयुक्त परिवारों का ढांचा टूटने से बुजुर्ग उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। यह विचार मुख्य अतिथि प्रो. अरविंद कुमार जोशी, पूर्व संकायाध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान संकाय, बीएचयू ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में सनातन संस्कृति की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है, जहाँ व्यक्तिवाद के बजाय समष्टिवादी सोच और लोककल्याण को महत्व दिया जाता है। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन, अतिथि स्वागत और कुलगीत से हुआ। महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सुधा पांडेय ने अतिथियों का स्वागत किया।

इस अवसर पर आयोजित ‘सनातन संस्कृति और हिन्दुत्व: भारत में उभरता सांस्कृतिक विमर्श’ विषयक द्विदिवसीय कांफ्रेंस की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए संयोजिका प्रिया मिश्रा ने कहा कि यह विषय आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है और व्यापक विमर्श का अवसर प्रदान करता है।

विषय प्रवर्तन प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी (बीएचयू) और प्रो. रचना शर्मा (जीडीसी, डीएलडब्ल्यू, वाराणसी) ने किया। उन्होंने सनातन और हिन्दुत्व के अन्तर्सम्बंधों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. सविता भारद्वाज, प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, उत्तर प्रदेश ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सनातन संस्कृति में संस्कारों की भूमिका और मानवीय दायित्वों पर बल दिया।
उल्लेखनीय है कि कांफ्रेंस के पहले दिन देशभर से लगभग पाँच सौ प्रतिनिधियों ने पंजीकरण कराया। कार्यक्रम का संचालन गीता रानी शर्मा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्रो. रविप्रकाश गुप्ता ने प्रस्तुत किया।
कांफ्रेंस को सफल बनाने में प्रो. कमलेश कुमार वर्मा, प्रो. रामकृष्ण, प्रो. सत्यनारायण, प्रो. अर्चना गुप्ता, डॉ. सर्वेश कुमार सिंह, डॉ. कमलेश कुमार सिंह, डॉ. सौरभ सिंह, डॉ. सुधा तिवारी, डॉ. सुष्मिता, रामकिंकर सिंह, रामायण विश्वकर्मा, मिठ्ठू राम और दयाराम सहित शोधार्थियों की अहम भूमिका रही।










