Search
Close this search box.

वाराणसी: द्वापर युग से कल्याण कर रहे तिलभांडेश्वर महादेव, हर वर्ष तिल के आकार जितना बढ़ता है शिवलिंग

वाराणसी: भगवान शंकर की नगरी काशी में उनके अनगिनत रूपों में से एक दिव्य और अद्भुत रूप तिलभांडेश्वर महादेव का भी है, जो सदियों से भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण कर रहे हैं। वाराणसी के केदारखंड स्थित सोनारपुरा क्षेत्र में विराजमान यह शिवलिंग द्वापर युग से पूजा का केंद्र रहा है और इसकी विशेषता यह है कि हर वर्ष यह एक तिल के आकार जितना स्वतः बढ़ता है।

स्वयंभू शिवलिंग की उत्पत्ति की कथा

शिव और काशी पुराण के अनुसार, द्वापर युग में सोनारपुरा क्षेत्र में तिल की खेती हुआ करती थी। एक दिन किसानों ने देखा कि तिल के खेत में एक अलग और बड़ा पेड़ उग आया है। जब उन्होंने पेड़ की कटाई की, तो उसमें से एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ। इस अद्भुत दृश्य को देखकर ग्रामीणों ने उसकी पूजा शुरू कर दी।

समय के साथ लोगों ने अनुभव किया कि यह शिवलिंग हर वर्ष एक तिल के बराबर बढ़ता है, जिससे इसकी दिव्यता को लेकर श्रद्धा और भी गहरी हो गई। यही कारण है कि इस शिवलिंग को “तिलभांडेश्वर” नाम से जाना जाने लगा।

मंदिर का निर्माण और पूजन परंपरा

इस स्थान पर कर्नाटक से आए ऋषि वीभांडव ने मंदिर का स्वरूप विकसित किया और विधिपूर्वक पूजन की परंपरा शुरू की। मान्यता है कि तिलभांडेश्वर महादेव की पूजा से पहले भूमि तल पर स्थापित बीभांडव ऋषि के रूप में शिवलिंग की पूजा की जाती है।

सूर्य और चंद्र के साथ विशेष संबंध

तिलभांडेश्वर महादेव की एक और विशेषता यह भी है कि उनके मस्तक पर सूर्य और चंद्र ग्रह की आकृतियाँ विराजमान हैं। पुराणों के अनुसार, इनका दर्शन एवं पूजन करने से सूर्य और चंद्र ग्रह अनुकूल होते हैं, और कुंडली दोष दूर होते हैं। साथ ही, भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।\

जनश्रुति और आस्था

वाराणसी के वरिष्ठ साहित्यकार रामयश मिश्र के अनुसार, “तिलभांडेश्वर महादेव भक्तों की सच्ची आस्था और श्रद्धा पर तुरंत कृपा करते हैं। यह स्थान सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र भी है।”

Leave a Comment

और पढ़ें