बलिया । जनपद के सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘बीज वक्ता’ के रूप में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराकर जिले का मान बढ़ाया। इस वैचारिक आयोजन में उन्हें विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।अपने मुख्य वक्तव्य में डॉ. उपाध्याय ने सनातन संस्कृति और रामकथा के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया।
उन्होंने रामायण के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए श्रीराम के ‘आतंकवाद विरोधी’ स्वरूप की नवीन व्याख्या की। उनके अनुसार ऋषियों की अस्थियों का विशाल ढेर केवल व्यक्तियों की हत्या का संकेत नहीं था, बल्कि वह उस काल की समृद्ध ज्ञान-परंपरा के विनाश का प्रतीक था।
उस समय ज्ञान ‘श्रुति परंपरा’ पर आधारित था, जब लिखित साधनों का विकास नहीं हुआ था। ऐसे में एक ऋषि की हत्या हजारों वर्षों की संचित बौद्धिक धरोहर के नष्ट होने के समान थी। इस भयावह स्थिति को देखकर श्रीराम की करुणा संकल्प में परिवर्तित हुई और उन्होंने ज्ञान-विरोधी शक्तियों के विनाश का प्रण लिया।
डॉ. उपाध्याय ने इसे वैश्विक सभ्यता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा का प्रथम व्यापक अभियान बताया।उन्होंने आगे कहा कि बुंदेलखंड में राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा हैं। रामराजा मंदिर से लेकर लोकगीतों—फाग और आल्हा—तक राम की छवि यहाँ की संस्कृति में गहराई से रची-बसी है।
बुंदेली साहित्य ने लोकभाषा के माध्यम से राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।संगोष्ठी में भारत सहित दस देशों के विद्वानों ने सहभागिता की और लगभग 100 शोधपत्र प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने की। इस अवसर पर डॉ. उपाध्याय को सम्मानित किए जाने से क्षेत्र में हर्ष का वातावरण है तथा इसे बलिया के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
रिपोर्टर अवधेश यादव








