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पत्रकारिता दिवस पर आत्ममंथन: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या टीआरपी का तमाशा

मुंबई। पत्रकारिता दिवस के अवसर पर जहां देशभर में मीडिया जगत को बधाइयां दी जा रही हैं, वहीं यह दिन भारतीय पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर गंभीर आत्ममंथन का भी अवसर है। कभी जनता की आवाज और सत्ता से सवाल पूछने वाली पत्रकारिता आज टीआरपी, राजनीतिक ध्रुवीकरण और कॉरपोरेट हितों के दबाव में अपनी मूल भूमिका से भटकती दिखाई दे रही है।

देश के वास्तविक मुद्दे—बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं—मुख्यधारा की खबरों से लगातार गायब होती जा रही हैं। उनकी जगह सनसनीखेज बहसें, धार्मिक विवाद और मनोरंजन आधारित सामग्री ने ले ली है। मीडिया पर पक्षधरता के आरोप लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ है।

विज्ञापनों और आर्थिक हितों की बढ़ती निर्भरता ने मीडिया की स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े किए हैं। वहीं सोशल मीडिया के दौर में फेक न्यूज और अपुष्ट सूचनाओं का प्रसार स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

हालांकि इस संकट के लिए केवल मीडिया ही जिम्मेदार नहीं है। दर्शकों और पाठकों की पसंद भी सामग्री की दिशा तय करती है। ऐसे में जरूरत है कि समाज गंभीर और तथ्याधारित पत्रकारिता को प्रोत्साहित करे तथा ईमानदार पत्रकारों का समर्थन करे। पत्रकारिता का मजबूत और निष्पक्ष होना लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य है।

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