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डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की 23वीं कृति ‘गांडीव के पार’ प्रकाशित, महाभारत के मौन पक्ष का गहन दार्शनिक विश्लेषण

प्रख्यात दार्शनिक एवं आध्यात्मिक साहित्यकार डॉ. विद्यासागर उपाध्याय की 23वीं मौलिक कृति ‘गांडीव के पार’ (खंडकाव्य) प्रकाशित होने पर विद्वत समाज में हर्ष व्याप्त है। इन्कसाइट पब्लिकेशन, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) से प्रकाशित यह कृति महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन के अंतर्मन, धर्म, सत्ता और आत्मबोध के गूढ़ प्रश्नों को केंद्र में रखकर लिखी गई है। खंडकाव्य में हिमालय प्रस्थान से पूर्व अर्जुन और परीक्षित के संवादों के माध्यम से कृष्ण उपदेशों की अनुभूतिजन्य व्याख्या प्रस्तुत की गई है।

लेखक ने महाभारत के उपेक्षित पात्र ‘कणिक’ की नीतियों के जरिए आधुनिक राजनीति और लोकलुभावन प्रवृत्तियों पर तीखा प्रहार किया है। कृति यह संदेश देती है कि धर्म के पक्ष में निर्णय लेने में विलंब और योग्य लोगों का मौन समाज के लिए घातक होता है।

साहित्यिक दृष्टि से भी यह कृति अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लगभग 350 वर्षों बाद ‘सर्वतोभद्र’ और ‘अनुलोम-विलोम’ जैसे दुर्लभ छंदों का प्रयोग कर डॉ. उपाध्याय ने हिंदी साहित्य में एक नया प्रतिमान स्थापित किया है।

अवधेश यादव रिपोर्टिंग।

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