“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए…”
अपनी ग़ज़लों और शेरों से करोड़ों दिलों में खास जगह बनाने वाले आधुनिक उर्दू के महान शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। लंबे समय से वह डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से साहित्य, शायरी और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
+2बशीर बद्र ने अपनी शायरी में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों और जिंदगी की सच्चाइयों को बेहद खूबसूरती से बयान किया। उनके लिखे शेर सिर्फ अल्फाज नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं की आवाज बन गए। “कोई हाथ भी न मिलाएगा…” और “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी…” जैसे अनगिनत शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
उन्हें साहित्य जगत में योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा गया था।
+1बशीर बद्र का जाना उर्दू अदब की दुनिया के लिए अपूरणीय क्षति है। उनकी शायरी हमेशा आने वाली पीढ़ियों के दिलों में रोशनी बनकर जिंदा रहेगी।




